हेडफोन और ईयरफोन का ज़्यादा इस्तेमाल कानों को कैसे प्रभावित कर सकता है? सुनने की सुरक्षित आदतें जानें
हेडफोन और ईयरफोन का ज्यादा इस्तेमाल कब सुनने के लिए जोखिम बढ़ा सकता है? जानें सुरक्षित वॉल्यूम, सुनने की अवधि, Listening Break और कानों की देखभाल से जुड़ी आसान जानकारी।

एक नज़र में (At a Glance)
हेडफोन या ईयरफोन से कानों पर असर मुख्य रूप से आवाज़ कितनी तेज़ है और कितनी देर तक सुनी जाती है, इस पर निर्भर करता है।
WHO की Safe Listening सलाह के अनुसार, पर्सनल ऑडियो डिवाइस का वॉल्यूम अधिकतम स्तर के 60% तक रखना सुनने की सुरक्षा के लिए एक आसान आदत हो सकती है।
लंबे समय तक तेज़ आवाज़ सुनने से सुनने की क्षमता प्रभावित होने का जोखिम बढ़ सकता है।
शोर वाली जगह पर अच्छी फिटिंग वाले या नॉइज़-कैंसलिंग हेडफोन वॉल्यूम बहुत ज़्यादा बढ़ाने की जरूरत को कम कर सकते हैं।
लगातार सुनने के बजाय बीच-बीच में Listening Break लेना और डिवाइस को साफ रखना अच्छी आदत है।
अगर कानों में सीटी या घंटी जैसी आवाज़, सुनने में बदलाव या बार-बार वॉल्यूम बढ़ाने की जरूरत महसूस हो, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें।
आज पर्सनल ऑडियो डिवाइस का इस्तेमाल इतना आम क्यों है?
आज हेडफोन और ईयरफोन रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए हैं। लोग इनका इस्तेमाल म्यूज़िक सुनने, फोन पर बात करने, ऑनलाइन क्लास, गेमिंग और ऑफिस मीटिंग के लिए करते हैं।
इनका इस्तेमाल अपने आप में गलत नहीं है। ध्यान देने वाली बात यह है कि आवाज़ कितनी तेज़ है, कितनी देर तक सुनी जा रही है और बीच में ब्रेक लिया जा रहा है या नहीं।
इस लेख में इन्हीं आसान बातों को समझेंगे, ताकि आप अपनी सुनने की आदतों को बेहतर रख सकें और किसी परेशानी के संकेत मिलने पर समय पर ध्यान दे सकें।
हेडफोन और ईयरफोन का ज़्यादा इस्तेमाल कानों को कैसे प्रभावित कर सकता है?
बहुत तेज़ आवाज़ में लंबे समय तक सुनने से सुनने की क्षमता प्रभावित होने का जोखिम बढ़ सकता है। अगर तेज़ आवाज़ का संपर्क बार-बार होता रहे, तो यह जोखिम और बढ़ सकता है।
इसमें खास तौर पर इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
बहुत तेज़ वॉल्यूम पर सुनना
लंबे समय तक लगातार सुनते रहना
बार-बार तेज़ आवाज़ के संपर्क में आना
सुनने के बीच पर्याप्त ब्रेक न लेना
WHO के अनुसार, तेज़ आवाज़ से जुड़े जोखिम को समझने में आवाज़ का स्तर, सुनने की अवधि और कितनी बार तेज़ आवाज़ के संपर्क में आ रहे हैं, ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए केवल वॉल्यूम कम रखना ही पर्याप्त नहीं है। कितनी देर सुन रहे हैं और बीच में आराम दे रहे हैं या नहीं, इसका भी ध्यान रखना चाहिए।
क्या केवल वॉल्यूम ही मायने रखता है? सुनने की अवधि क्यों महत्वपूर्ण है?
कई लोगों को लगता है कि अगर आवाज़ बहुत तेज़ नहीं है, तो लंबे समय तक सुनने से कोई समस्या नहीं होगी। लेकिन सुनने की सुरक्षा में आवाज़ का स्तर और सुनने का समय दोनों महत्वपूर्ण होते हैं।
इसे आसान तरीके से समझें:
तेज़ आवाज़ + लंबे समय तक सुनना + बार-बार संपर्क = सुनने से जुड़ा जोखिम बढ़ सकता है।
WHO की Safe Listening guidance में भी आवाज़ की तीव्रता के साथ सुनने की अवधि को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया है।
इसलिए म्यूज़िक, कॉल या वीडियो सुनते समय सिर्फ वॉल्यूम पर नहीं, बल्कि कुल सुनने के समय और ब्रेक पर भी ध्यान दें।
बहुत तेज़ आवाज़ में हेडफोन इस्तेमाल करने पर क्या हो सकता है?
अगर हेडफोन या ईयरफोन से बहुत तेज़ आवाज़ लंबे समय तक सुनी जाए, तो सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। कुछ लोगों को इस्तेमाल के बाद इस तरह के बदलाव महसूस हो सकते हैं:
कान में घंटी, सीटी या भिनभिनाहट जैसी आवाज़
आवाज़ें कुछ समय के लिए धीमी या दबी हुई लगना
सुनने में परेशानी महसूस होना
बातचीत समझने में पहले से अधिक परेशानी होना
NIDCD के अनुसार, लंबे समय तक तेज़ आवाज़ के संपर्क में रहने से सुनने की क्षमता को नुकसान पहुँच सकता है।
ध्यान रखें कि कान में घंटी या भिनभिनाहट कई अलग-अलग कारणों से हो सकती है। अगर ऐसा बार-बार हो या बना रहे, तो डॉक्टर या Hearing Professional से सलाह लेना उचित है।
तेज़ आवाज़ के कानों पर असर के बारे में अधिक जानकारी के लिए तेज़ आवाज़ का कानों पर असर लेख भी पढ़ सकते हैं।
ईयरफोन और हेडफोन में क्या अंतर है?
ईयरफोन और हेडफोन का डिजाइन अलग होता है, इसलिए दोनों का इस्तेमाल करने का अनुभव भी अलग हो सकता है। लेकिन सुनने की सुरक्षा के मामले में केवल डिवाइस का प्रकार ही महत्वपूर्ण नहीं है।
इन बातों को ध्यान में रखें:
फिटिंग: ईयरफोन आमतौर पर कान के अंदर या कान के पास लगाए जाते हैं, जबकि ओवर-ईयर हेडफोन कानों को बाहर से कवर करते हैं।
आसपास का शोर: शोर वाली जगह पर आवाज़ साफ़ न सुनाई देने पर लोग वॉल्यूम बढ़ा सकते हैं।
आराम: लंबे समय तक इस्तेमाल में कौन-सा विकल्प आरामदायक है, यह व्यक्ति और डिवाइस की फिटिंग पर निर्भर करता है।
सुनने की आदत: दोनों में ही बहुत तेज़ आवाज़ में लंबे समय तक सुनने से बचना चाहिए।
इसलिए किसी एक डिवाइस को हर व्यक्ति के लिए “पूरी तरह सुरक्षित” कहना सही नहीं होगा। सुनने की सुरक्षा के लिए वॉल्यूम, समय और ब्रेक पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है।
नॉइज़-कैंसलिंग हेडफोन वॉल्यूम कम रखने में कैसे मदद कर सकते हैं?
शोर वाली जगह पर आसपास की आवाज़ के कारण म्यूज़िक या कॉल साफ़ सुनाई नहीं देती। ऐसे में कुछ लोग अनजाने में वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।
नॉइज़-कैंसलिंग या अच्छी फिटिंग वाले हेडफोन आसपास के शोर को कम महसूस करने में मदद कर सकते हैं। इससे बहुत अधिक वॉल्यूम रखने की जरूरत कम हो सकती है।
हालांकि, नॉइज़-कैंसलिंग सुविधा का मतलब यह नहीं है कि हेडफोन किसी भी वॉल्यूम पर पूरी तरह सुरक्षित हो जाते हैं। वॉल्यूम और सुनने की अवधि, दोनों का ध्यान रखना जरूरी है।
ईयरफोन का वॉल्यूम कितना रखना चाहिए?
WHO की Safe Listening guidance के अनुसार, पर्सनल ऑडियो डिवाइस का वॉल्यूम अधिकतम स्तर के 60% से अधिक न रखना सुनने की सुरक्षा के लिए एक आसान तरीका हो सकता है।
WHO के अनुसार, 80 dB तक की आवाज़ के लिए सप्ताह में 40 घंटे तक सुनने की एक संदर्भ सीमा दी गई है। जैसे-जैसे आवाज़ का स्तर बढ़ता है, सुरक्षित सुनने का समय कम होता जाता है।
ध्यान रखें कि हर डिवाइस में वास्तविक आवाज़ का स्तर अलग हो सकता है। इसलिए केवल फोन के volume percentage पर निर्भर न रहें। अगर आपके डिवाइस में sound-level या hearing-exposure monitoring जैसी सुविधा उपलब्ध है, तो उसका इस्तेमाल भी किया जा सकता है।
हेडफोन इस्तेमाल करते समय ब्रेक लेना क्यों ज़रूरी है?
लंबे समय तक लगातार सुनने के बजाय बीच-बीच में Listening Break लेना एक अच्छी आदत है। इससे तेज़ आवाज़ के लगातार संपर्क को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसे रोज़मर्रा की आदत बनाना आसान है:
लंबे समय तक म्यूज़िक या कॉल सुनने के बीच छोटे ब्रेक लें।
ब्रेक के दौरान शांत वातावरण में रहें।
आवाज़ तेज़ लग रही हो तो वॉल्यूम कम करें।
लंबे समय तक लगातार तेज़ आवाज़ में सुनने से बचें।
अगर कान में लगातार घंटी या भिनभिनाहट सुनाई दे या सुनने में परेशानी महसूस हो, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या Hearing Professional से सलाह लें।
अगर कान में रिंगिंग, सीटी या भिनभिनाहट जैसी आवाज़ बार-बार महसूस होती है, तो टिनिटस के कारण और लक्षण के बारे में भी पढ़ सकते हैं।
शोर वाली जगह पर वॉल्यूम बढ़ाना सही है या नहीं?
मेट्रो, ट्रैफिक, जिम या पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसी जगहों पर आसपास का शोर ज्यादा हो सकता है। ऐसे में आवाज़ साफ़ सुनने के लिए वॉल्यूम बढ़ाने का मन हो सकता है।
बेहतर विकल्प:
वॉल्यूम को जरूरत से ज्यादा न बढ़ाएं।
अच्छी फिटिंग वाले हेडफोन या ईयरफोन इस्तेमाल करें।
शोर वाली जगह पर नॉइज़-कैंसलिंग विकल्प पर विचार करें।
जहां संभव हो, बहुत शोर वाली जगह से थोड़ी दूरी बनाएं।
WHO की Safe Listening guidance के अनुसार, अच्छी फिटिंग वाले या नॉइज़-कैंसलिंग हेडफोन शोर वाले माहौल में वॉल्यूम बढ़ाने की जरूरत को कम करने में मदद कर सकते हैं।
सुनने से जुड़े किन संकेतों पर ध्यान दें?
अगर इस्तेमाल के बाद या सुनते समय कानों से जुड़े कुछ बदलाव बार-बार महसूस हों, तो उन पर ध्यान देना बेहतर है।
इन संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें:
कानों में लगातार रिंगिंग या भिनभिनाहट
आवाज़ पहले की तुलना में कम साफ़ सुनाई देना
बातचीत समझने में परेशानी
बार-बार वॉल्यूम बढ़ाने की जरूरत महसूस होना
ये संकेत किसी एक बीमारी का पक्का प्रमाण नहीं हैं। लेकिन अगर ये बदलाव लगातार बने रहें या सुनने में परेशानी बढ़ती जाए, तो डॉक्टर या Hearing Professional से जांच की सलाह लेना उचित है।
अगर कान में मैल जमा होने के साथ रिंगिंग जैसी आवाज़ महसूस होती है, तो कान में मैल और टिनिटस के संबंध के बारे में अधिक जानकारी पढ़ सकते हैं।
हेडफोन और ईयरफोन की सफाई कैसे रखें?
डिवाइस की साफ-सफाई रखना भी अच्छी आदत है। खासकर ईयरफोन इस्तेमाल करते समय उन्हें साफ़ और सूखा रखना बेहतर होता है।
दूसरे व्यक्ति के साथ ईयरफोन शेयर करने से बचें।
ईयरफोन और हेडफोन को नियमित रूप से साफ़ रखें।
गीले ईयरबड्स को कान में न लगाएं।
सफाई के लिए निर्माता के दिए निर्देशों का पालन करें।
यह सामान्य हाइजीन सलाह है। केवल ईयरफोन के इस्तेमाल को किसी संक्रमण का सीधा कारण नहीं माना जाना चाहिए।
अगर कान में दर्द, खुजली, डिस्चार्ज या कोई अन्य परेशानी बनी रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।
कान की स्वच्छता और फंगल इंफेक्शन से जुड़ी सामान्य जानकारी के लिए कान में फंगल इंफेक्शन के कारण और बचाव लेख भी पढ़ सकते हैं।
बच्चों और किशोरों के लिए क्या सावधानी रखें?
बच्चे और किशोर भी पढ़ाई, गेमिंग, वीडियो और मनोरंजन के लिए हेडफोन या ईयरफोन का इस्तेमाल करते हैं। उनके मामले में वॉल्यूम और सुनने का समय दोनों पर ध्यान देना जरूरी है।
अभिभावक इन आसान आदतों को बढ़ावा दे सकते हैं:
डिवाइस के वॉल्यूम पर नजर रखें।
अगर वॉल्यूम लिमिट की सुविधा है, तो उसका इस्तेमाल करें।
लगातार सुनने के बजाय बीच-बीच में ब्रेक दिलाएं।
लंबे समय तक तेज़ आवाज़ में सुनने से बचने की आदत डालें।
बच्चों के लिए सुनने का जोखिम आवाज़ के स्तर, सुनने की अवधि और बार-बार होने वाले संपर्क पर निर्भर कर सकता है। इसलिए कम उम्र से ही सुरक्षित सुनने की आदतें सिखाना बेहतर है।
सुरक्षित सुनने के लिए 7 आसान आदतें
सुनने की सेहत का ध्यान रखने के लिए रोज़मर्रा में इन आसान आदतों को अपनाया जा सकता है:
वॉल्यूम को मध्यम स्तर पर रखें।
अधिकतम वॉल्यूम पर लंबे समय तक न सुनें।
लगातार सुनने के बीच नियमित ब्रेक लें।
शोर वाली जगह पर वॉल्यूम अनावश्यक रूप से न बढ़ाएं।
अच्छी फिटिंग वाले हेडफोन या ईयरफोन चुनें।
डिवाइस में उपलब्ध वॉल्यूम लिमिट या Safe Listening सेटिंग का इस्तेमाल करें।
सुनने से जुड़ी परेशानी लगातार बनी रहे, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें।
कानों की सामान्य देखभाल के लिए आप आयुर्वेदिक उत्पाद के बारे में भी जानकारी देख सकते हैं। इस्तेमाल से पहले उत्पाद पर दिए गए निर्देशों को ध्यान से पढ़ें।
WHO की Safe Listening guidance में भी आवाज़ का स्तर कम रखने, सुनने का समय सीमित रखने और उपलब्ध Safe Listening सुविधाओं का इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. हेडफोन का वॉल्यूम कितना रखना चाहिए?
WHO की सलाह के अनुसार, पर्सनल ऑडियो डिवाइस का वॉल्यूम अधिकतम स्तर के 60% से नीचे रखना एक आसान सुरक्षित सुनने की आदत हो सकती है। हालांकि, डिवाइस और आसपास के शोर के कारण वास्तविक आवाज़ का स्तर अलग हो सकता है।
2. क्या ईयरफोन हेडफोन से ज्यादा नुकसानदायक होते हैं?
ऐसा कहना सही नहीं है कि ईयरफोन हमेशा हेडफोन से ज्यादा नुकसानदायक होते हैं। सुनने की सुरक्षा के लिए वॉल्यूम, सुनने की अवधि और इस्तेमाल की आवृत्ति अधिक महत्वपूर्ण बातें हैं।
3. कितनी देर तक हेडफोन इस्तेमाल करना ठीक है?
सभी लोगों के लिए एक ही तय समय बताना सही नहीं होगा। बहुत लंबे समय तक लगातार सुनने से बचें और बीच-बीच में Listening Break लें।
4. क्या नॉइज़-कैंसलिंग हेडफोन पूरी तरह सुरक्षित हैं?
नहीं। नॉइज़-कैंसलिंग हेडफोन शोर वाले माहौल में वॉल्यूम बढ़ाने की जरूरत को कम करने में मदद कर सकते हैं। लेकिन इन्हें किसी भी वॉल्यूम या किसी भी अवधि के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता।
5. बच्चों के लिए हेडफोन इस्तेमाल में क्या सावधानी रखें?
बच्चों के लिए वॉल्यूम पर नजर रखना, उपलब्ध होने पर वॉल्यूम लिमिट का इस्तेमाल करना और नियमित ब्रेक दिलाना अच्छी आदतें हैं।
6. शोर वाली जगह पर वॉल्यूम बढ़ाने के बजाय क्या करें?
वॉल्यूम बहुत ज्यादा बढ़ाने के बजाय अच्छी फिटिंग वाले या नॉइज़-कैंसलिंग हेडफोन इस्तेमाल किए जा सकते हैं। जहां संभव हो, शोर वाली जगह से थोड़ी दूरी बनाना भी मदद कर सकता है।
7. हेडफोन इस्तेमाल करने के बाद कान में आवाज़ आए तो क्या करें?
अगर कान में रिंगिंग, भिनभिनाहट या सुनने में बदलाव बार-बार या लगातार महसूस हो, तो डॉक्टर या Hearing Professional से सलाह लेना उचित है।
8. क्या शेयर किए गए ईयरफोन इस्तेमाल करना ठीक है?
साफ-सफाई के लिहाज़ से ईयरफोन शेयर करने से बचना बेहतर है। अपने डिवाइस को नियमित रूप से साफ़ रखें और उसे गीला होने से बचाएं।
निष्कर्ष
हेडफोन और ईयरफोन आज रोज़मर्रा की जरूरत बन चुके हैं। इसलिए इन्हें पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है। मध्यम वॉल्यूम, सीमित सुनने का समय और बीच-बीच में ब्रेक सुनने की सेहत का ध्यान रखने वाली अच्छी आदतें हैं।
शोर वाली जगह पर वॉल्यूम बहुत ज्यादा बढ़ाने के बजाय अच्छी फिटिंग वाले या नॉइज़-कैंसलिंग विकल्प इस्तेमाल किए जा सकते हैं। साथ ही, ईयरफोन और हेडफोन की साफ-सफाई का ध्यान रखना भी जरूरी है।
अगर कान में रिंगिंग, सुनने में बदलाव या कोई दूसरी परेशानी बार-बार या लगातार बनी रहती है, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें। जरूरत पड़ने पर योग्य डॉक्टर या ENT/Hearing विशेषज्ञ से सलाह लें।
अस्वीकरण
यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता और जानकारी के उद्देश्य से है। यह व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। अगर सुनने से जुड़ा कोई लक्षण लगातार बना रहता है या बढ़ रहा है, तो योग्य डॉक्टर या ENT/Hearing विशेषज्ञ से संपर्क करें।
स्रोत (Sources)
World Health Organization (WHO): Safe Listening
National Institute on Deafness and Other Communication Disorders (NIDCD): Noise-Induced Hearing Loss
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Disclaimer: This article is for general informational purposes only and is not a substitute for professional medical advice. Always consult a qualified Ayurvedic practitioner or physician before acting on any information here.
About the Author

डॉ. सुहैल सिद्दीकी (Dr Suhail Siddiqui), B.A.M.S., एक योग्य एवं पंजीकृत आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं। उन्होंने चौधरी ब्रह्म प्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान (Choudhary Brahm Prakash Ayurved Charak Sansthan), गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से वर्ष 2024 में बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी (B.A.M.S.) की डिग्री प्राप्त की है। वे उत्तर प्रदेश बोर्ड ऑफ इंडियन मेडिसिन (UP Board of Indian Medicine) में पंजीकृत चिकित्सक हैं — रजिस्ट्रेशन संख्या 77487 — और वर्तमान में SS Herbal India के साथ आयुर्वेदिक चिकित्सक (Ayurvedic Physician) के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, जीवनशैली प्रबंधन और रोगों की रोकथाम से जुड़े विषयों में विशेष रुचि है। डॉ. सुहैल मुख्य रूप से कान, नाक और गला (ENT) से संबंधित समस्याओं, टिनिटस (Tinnitus), कान में फंगल इंफेक्शन, हकलाना, पथरी, मधुमेह, पाचन संबंधी समस्याओं तथा अन्य सामान्य स्वास्थ्य विषयों पर आयुर्वेद आधारित जानकारी साझा करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल स्वास्थ्य विषयों को सरल भाषा में समझाकर लोगों तक विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी पहुँचाना है। SS Herbal India पर प्रकाशित लेखों के लिए डॉ. सुहैल आयुर्वेदिक ग्रंथों, उपलब्ध आधुनिक शोध, चिकित्सा साहित्य तथा विश्वसनीय स्वास्थ्य स्रोतों का अध्ययन करते हैं। उनके नाम से प्रकाशित होने वाला प्रत्येक लेख प्रकाशन से पहले उनकी समीक्षा से होकर जाता है। प्रत्येक लेख का उद्देश्य पाठकों को संतुलित, तथ्य-आधारित और उपयोगी स्वास्थ्य जानकारी प्रदान करना है। यह जानकारी केवल शैक्षणिक एवं जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की जाती है और किसी भी प्रकार से व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। डॉ. सुहैल सिद्दीकी का लक्ष्य लोगों को सही स्वास्थ्य जानकारी देकर उन्हें स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, रोगों की बेहतर समझ विकसित करने और अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनने में सहायता करना है।
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