आँखों का नंबर क्यों बढ़ता है? बच्चों और बड़ों में मायोपिया के कारण और बचाव
बच्चों और बड़ों में आँखों का नंबर बढ़ने के पीछे मायोपिया, आँख की लंबाई में बदलाव और कुछ स्वास्थ्य स्थितियाँ कारण हो सकती हैं। जानें मायोपिया के लक्षण, जोखिम से जुड़े कारक, बचाव की आदतें और इसकी प्रगति धीमी करने के विकल्प।
Ayurvedic Physician · Reg. No. 77487, UP Board of Indian Medicine

एक नज़र में
मायोपिया (Myopia) में पास की चीज़ें साफ़ दिखाई देती हैं, लेकिन दूर की चीज़ें धुंधली नज़र आ सकती हैं।
आँख की लंबाई और कॉर्निया या लेंस की फोकस करने की शक्ति में बदलाव मायोपिया की वजह बन सकते हैं।
परिवार में मायोपिया का इतिहास, बाहर कम समय बिताना और लंबे समय तक पास की चीज़ों पर काम करना इसके जोखिम से जुड़े कारक हैं।
दिन के उजाले में बाहर समय बिताने से बच्चों में मायोपिया शुरू होने का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
नियमित आँखों की जाँच से नज़र में होने वाले बदलाव का समय पर पता लगाया जा सकता है।
मायोपिया की प्रगति धीमी करने के कुछ उपाय बच्चों में नंबर बढ़ने की गति कम करने में मदद कर सकते हैं।
विषय सूची
आँखों का नंबर बढ़ने का क्या मतलब होता है?
मायोपिया (Myopia) क्या होता है?
मायोपिया में आँख के अंदर क्या बदलाव होता है?
बच्चों में आँखों का नंबर बढ़ने के मुख्य कारण
बड़ों में आँखों का नंबर क्यों बदलता है?
आँखों का नंबर बढ़ने के संकेत कैसे पहचानें?
मायोपिया के जोखिम को कम करने के लिए क्या करें?
क्या मायोपिया की प्रगति धीमी की जा सकती है?
आँखों की जाँच कब करानी चाहिए?
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
दूर की चीज़ें धुंधली दिखाई देना या स्कूल में ब्लैकबोर्ड पढ़ने में परेशानी होना मायोपिया (Myopia) यानी निकट दृष्टि दोष के संकेत हो सकते हैं। इसमें पास की चीज़ें साफ़ दिखाई देती हैं, लेकिन दूर रखी वस्तुएँ धुंधली नज़र आती हैं।
बच्चों में यह समस्या अक्सर स्कूल जाने की उम्र में सामने आती है। उम्र बढ़ने के साथ कुछ बच्चों में चश्मे का नंबर भी बदल सकता है। वयस्कों में भी नज़र में बदलाव हो सकता है, लेकिन इसकी वजह हमेशा मायोपिया नहीं होती।
इस लेख में जानेंगे कि बच्चों और बड़ों में आँखों का नंबर क्यों बढ़ता है, मायोपिया के जोखिम क्या हैं और आँखों की सेहत का ध्यान रखने के लिए कौन-सी आदतें उपयोगी हो सकती हैं।
आँखों का नंबर बढ़ने का क्या मतलब होता है?
आँखों का नंबर चश्मे के लेंस की शक्ति (Power) को दर्शाता है। सही नंबर का लेंस रोशनी को आँख के पीछे मौजूद रेटिना (Retina) पर सही जगह फोकस करने में मदद करता है। रेटिना पर ही देखी जा रही चीज़ की छवि बनती है।
आँख की बनावट या रोशनी को फोकस करने की क्षमता में बदलाव आने पर चश्मे का नंबर बदल सकता है। मायोपिया में दूर की चीज़ें साफ़ देखने के लिए आमतौर पर माइनस (-) नंबर के लेंस दिए जाते हैं।
इसलिए चश्मे का नंबर बदलने पर उसकी वजह समझना ज़रूरी है। हर बार नंबर बदलने का मतलब मायोपिया बढ़ना नहीं होता।
मायोपिया (Myopia) क्या होता है?
मायोपिया को निकट दृष्टि दोष भी कहते हैं। इसमें पास की चीज़ें साफ़ दिखाई देती हैं, लेकिन दूर रखी वस्तुएँ धुंधली नज़र आती हैं।
उदाहरण के लिए, किसी बच्चे को किताब पढ़ने में परेशानी नहीं होती, लेकिन कक्षा में लगा ब्लैकबोर्ड साफ़ दिखाई नहीं देता।
यह एक अपवर्तन संबंधी दोष (Refractive Error) है। इसका मतलब है कि आँख में आने वाली रोशनी रेटिना पर सही जगह फोकस नहीं हो पाती।
नज़र से जुड़ी कुछ दूसरी स्थितियाँ भी हैं:
हाइपरमेट्रोपिया (Hyperopia): इसमें पास की चीज़ों पर फोकस करने में परेशानी हो सकती है। अधिक नंबर होने पर दूर की दृष्टि भी प्रभावित हो सकती है।
प्रेसबायोपिया (Presbyopia): उम्र बढ़ने के साथ पास की चीज़ों पर फोकस करने की क्षमता कम होने लगती है।
ये सभी अलग-अलग स्थितियाँ हैं। इसलिए केवल धुंधला दिखाई देने के आधार पर खुद से किसी समस्या की पहचान नहीं करनी चाहिए।
मायोपिया में आँख के अंदर क्या बदलाव होता है?
सामान्य आँख में कॉर्निया (Cornea) और आँख के अंदर मौजूद लेंस रोशनी को मोड़कर रेटिना पर फोकस करते हैं। इससे देखी जा रही चीज़ की साफ़ छवि बनती है।
मायोपिया में आँख की बनावट या फोकस करने की शक्ति में बदलाव हो सकता है। इसके कुछ प्रमुख कारण हैं:
आँख की लंबाई बढ़ना
आँख आगे से पीछे की ओर सामान्य से अधिक लंबी हो सकती है। इसे अक्षीय लंबाई (Axial Length) बढ़ना कहते हैं। ऐसी स्थिति में रोशनी रेटिना पर पहुँचने से पहले ही फोकस हो जाती है, जिससे दूर की चीज़ें धुंधली दिखाई देती हैं।
कॉर्निया या लेंस की फोकस करने की शक्ति में बदलाव
कॉर्निया आँख की सामने की पारदर्शी परत होती है। कुछ लोगों में इसका घुमाव सामान्य से अधिक हो सकता है या इसकी अपवर्तन शक्ति ज़्यादा हो सकती है। आँख के लेंस की फोकस करने की शक्ति में बदलाव भी मायोपिया में भूमिका निभा सकता है।
हर व्यक्ति में मायोपिया का कारण एक जैसा नहीं होता। कुछ लोगों में आँख की लंबाई और कुछ में आँख की फोकस करने की शक्ति से जुड़े बदलाव अधिक प्रभाव डाल सकते हैं।
बच्चों में आँखों का नंबर बढ़ने के मुख्य कारण
बच्चों में मायोपिया शुरू होने या बढ़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। परिवार में इसका इतिहास, पास की चीज़ों पर लंबे समय तक काम करना और बाहर कम समय बिताना इसके जोखिम से जुड़े कारक हैं।
इनमें से कोई एक बात हर बच्चे में मायोपिया होने की निश्चित वजह नहीं होती।
1. परिवार में मायोपिया का इतिहास
अगर माता-पिता में से किसी एक या दोनों को मायोपिया है, तो बच्चे में भी इसके होने की संभावना बढ़ सकती है।
इसमें आनुवंशिकता की भूमिका हो सकती है। परिवार से मिलने वाले कुछ गुण आँखों की बनावट और विकास को प्रभावित कर सकते हैं।
हालाँकि, माता-पिता को चश्मा होने का यह मतलब नहीं है कि बच्चे को भी मायोपिया ज़रूर होगा। बच्चे की उम्र, आँखों की बनावट और आसपास का वातावरण भी मायने रखते हैं।
2. पास की चीज़ों पर लंबे समय तक ध्यान लगाना
बच्चे पढ़ाई, लिखने, चित्र बनाने और मोबाइल या दूसरी स्क्रीन देखने में काफी समय बिता सकते हैं। कुछ शोधों में लंबे समय तक पास की चीज़ों पर काम करने और बच्चों में मायोपिया के जोखिम के बीच संबंध पाया गया है।
लेकिन केवल पढ़ाई या मोबाइल इस्तेमाल को इसका अकेला कारण कहना सही नहीं होगा। इसमें कई कारकों की भूमिका हो सकती है।
इसलिए पढ़ाई के साथ बच्चों को बाहर खेलने, दूसरी गतिविधियाँ करने और बीच-बीच में आराम करने का समय भी देना चाहिए।
लंबे समय तक मोबाइल या कंप्यूटर देखने से आँखों में थकान, सूखापन और असहजता महसूस हो सकती है। स्क्रीन इस्तेमाल करते समय आँखों को आराम देने के लिए 20-20-20 नियम के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारा लेख पढ़ें:
डिजिटल आई स्ट्रेन और 20-20-20 नियम
3. बाहर कम समय बिताना
बच्चों में दिन के उजाले में बाहर कम समय बिताने और मायोपिया शुरू होने के अधिक जोखिम के बीच संबंध देखा गया है। वहीं, बाहर समय बिताने से इसके शुरू होने का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
बच्चों को सुरक्षित तरीके से बाहर खेलने, टहलने और खुले वातावरण में दूसरी गतिविधियाँ करने का अवसर दें। तेज़ धूप में सीधे सूरज की ओर देखने से बचना चाहिए।
बाहर समय बिताना उपयोगी आदत है, लेकिन इससे मायोपिया को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं मिलती।
4. कम उम्र में मायोपिया शुरू होना
मायोपिया अक्सर स्कूल जाने की उम्र में सामने आता है। कुछ बच्चों में यह उम्र बढ़ने के साथ आगे भी बढ़ सकता है।
कम उम्र में इसकी पहचान होने पर नियमित जाँच ज़रूरी है। इससे नेत्र विशेषज्ञ यह देख सकते हैं कि चश्मे का नंबर कितनी गति से बदल रहा है और मायोपिया की प्रगति धीमी करने के विकल्पों पर विचार करने की ज़रूरत है या नहीं।
बड़ों में आँखों का नंबर क्यों बदलता है?
वयस्कों में चश्मे का नंबर बदलने के कई कारण हो सकते हैं। कुछ लोगों में पहले से मौजूद मायोपिया बढ़ सकता है, जबकि कुछ में उम्र या स्वास्थ्य से जुड़ी स्थितियों के कारण नज़र बदल सकती है।
इसलिए हर बार चश्मे का नंबर बदलने का मतलब मायोपिया बढ़ना नहीं होता।
1. पहले से मौजूद मायोपिया का बढ़ना
कुछ लोगों में यह समस्या बचपन या किशोरावस्था में शुरू होती है और शुरुआती वयस्क उम्र तक बढ़ सकती है। कई लोगों में एक समय बाद नंबर स्थिर हो जाता है, जबकि कुछ में बदलाव जारी रह सकता है।
यह हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता। अगर दूर देखने में पहले से ज़्यादा परेशानी हो रही है या चश्मा लगाने के बाद भी साफ़ नहीं दिखता, तो आँखों की जाँच कराएँ।
2. आँखों की फोकस करने की क्षमता में उम्र के साथ बदलाव
प्रेसबायोपिया (Presbyopia) उम्र बढ़ने के साथ होने वाला एक सामान्य बदलाव है। इसमें आँख के अंदर मौजूद लेंस धीरे-धीरे कम लचीला होने लगता है। इस वजह से पास रखी चीज़ों पर फोकस करना मुश्किल हो सकता है।
यह बदलाव आमतौर पर 40 वर्ष के आसपास या उसके बाद महसूस होने लगता है। उदाहरण के लिए, किताब या मोबाइल पढ़ते समय उसे आँखों से थोड़ा दूर रखना पड़ सकता है।
प्रेसबायोपिया और मायोपिया अलग स्थितियाँ हैं। मायोपिया में दूर की चीज़ें धुंधली दिखती हैं, जबकि प्रेसबायोपिया में पास की चीज़ों पर फोकस करने में परेशानी होती है। दोनों एक ही व्यक्ति को हो सकती हैं।
3. कुछ स्वास्थ्य स्थितियों का प्रभाव
कुछ स्वास्थ्य समस्याएँ भी नज़र और चश्मे के नंबर में बदलाव ला सकती हैं।
डायबिटीज़: रक्त शर्करा के स्तर में उतार-चढ़ाव से आँख के लेंस पर असर पड़ सकता है। इससे कुछ समय के लिए धुंधला दिखाई दे सकता है या चश्मे के नंबर में बदलाव महसूस हो सकता है।
मोतियाबिंद (Cataract): आँख के प्राकृतिक लेंस में धुंधलापन आने से देखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। कुछ लोगों में इस दौरान चश्मे के नंबर में भी बदलाव होता है।
ऐसी स्थिति में केवल चश्मे का नंबर बदलवाना पर्याप्त नहीं हो सकता। आँखों की जाँच कराना और ज़रूरत पड़ने पर संबंधित डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है।
आँखों का नंबर बढ़ने के संकेत कैसे पहचानें?
बच्चों और बड़ों में नज़र से जुड़ी कुछ परेशानियाँ दिखाई दे सकती हैं। बच्चों को कई बार यह समझ नहीं आता कि उन्हें दूर की चीज़ें पहले से कम साफ़ दिखाई दे रही हैं।
इन संकेतों पर ध्यान दें:
दूर रखी चीज़ें या ब्लैकबोर्ड धुंधला दिखाई देना।
स्कूल में बोर्ड पढ़ने में परेशानी होना।
दूर देखने के लिए बार-बार आँखें सिकोड़ना।
टीवी या दूर रखी चीज़ों को देखने के लिए उनके पास जाना।
पुराने चश्मे से साफ़ दिखाई न देना।
ये संकेत मायोपिया या किसी दूसरी दृष्टि संबंधी समस्या से जुड़े हो सकते हैं। केवल इनके आधार पर खुद से बीमारी तय न करें। सही वजह जानने के लिए आँखों की जाँच ज़रूरी है।
आँखों में जलन, थकान और सूखापन हमेशा चश्मे का नंबर बढ़ने के कारण नहीं होते। इनके दूसरे संभावित कारणों और बचाव से जुड़ी जानकारी के लिए हमारा लेख पढ़ें:
आँखों में जलन, थकान और सूखापन: कारण और बचाव
मायोपिया के जोखिम को कम करने के लिए क्या करें?
मायोपिया को हर स्थिति में रोक पाना संभव नहीं है। फिर भी बच्चों की कुछ आदतों में बदलाव करने से इसके शुरू होने का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है। जिन बच्चों को यह समस्या पहले से है, उनके लिए नेत्र विशेषज्ञ की सलाह से नंबर बढ़ने की गति धीमी करने के विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
1. बच्चों को दिन के उजाले में बाहर समय बिताने दें
बच्चों को रोज़ सुरक्षित तरीके से बाहर खेलने, टहलने या दूसरी बाहरी गतिविधियाँ करने का मौका दें।
दिन के उजाले में बाहर समय बिताना बच्चों में मायोपिया शुरू होने के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की जानकारी में भी बच्चों के लिए बाहर समय बिताने को उपयोगी उपायों में शामिल किया गया है।
बाहर समय बिताने से मायोपिया होने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती। इसलिए इसे नियमित आँखों की जाँच का विकल्प न समझें।
2. पढ़ते समय उचित दूरी बनाए रखें
बच्चों को किताब, कॉपी या मोबाइल बहुत पास रखकर पढ़ने से बचने के लिए समझाएँ।
पढ़ते समय ऐसी दूरी रखें, जहाँ से अक्षर आसानी से पढ़े जा सकें।
पढ़ाई की जगह पर पर्याप्त रोशनी रखें।
किताब या स्क्रीन को आँखों के बहुत पास न रखें।
अगर बच्चे को पढ़ने या देखने में परेशानी हो, तो नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लें।
3. लगातार पास की चीज़ों पर ध्यान लगाने से बचें
लंबे समय तक लगातार पढ़ाई या स्क्रीन देखने के बीच छोटे-छोटे विराम लें। इससे आँखों की थकान कम करने में मदद मिल सकती है।
20-20-20 नियम डिजिटल आई स्ट्रेन से जुड़ी परेशानी कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें हर 20 मिनट बाद लगभग 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर रखी किसी चीज़ को देखने की सलाह दी जाती है।
ध्यान रखें, यह नियम मायोपिया रोकने या चश्मे का नंबर कम करने का प्रमाणित तरीका नहीं है।
4. बच्चों की आँखों की नियमित जाँच कराएँ
समय पर जाँच कराने से नज़र में होने वाले बदलाव का पता लगाया जा सकता है। जाँच कितनी बार करानी है, यह बच्चे की उम्र, पहले की रिपोर्ट, पारिवारिक इतिहास और देखने में हो रही परेशानी पर निर्भर करता है।
अगर बच्चा ब्लैकबोर्ड साफ़ नहीं देख पा रहा है या दूर देखने के लिए बार-बार आँखें सिकोड़ता है, तो उसकी आँखों की जाँच कराएँ।
स्कूल में होने वाली सामान्य दृष्टि-जाँच को आँखों की पूरी जाँच का विकल्प न समझें।
5. डॉक्टर की सलाह के बिना चश्मे का नंबर न बदलें
पुराना चश्मा छोड़ देना, कम नंबर का चश्मा पहनना या चश्मा न लगाना मायोपिया रोकने का सही तरीका नहीं है।
सही नंबर का चश्मा दूर की चीज़ें साफ़ देखने में मदद करता है। चश्मा पहनने से आँखें कमज़ोर नहीं होतीं और केवल चश्मा पहनने की वजह से मायोपिया नहीं बढ़ता।
अगर पुराने चश्मे से साफ़ दिखाई नहीं दे रहा है, तो जाँच कराकर सही नंबर लें।
क्या मायोपिया की प्रगति धीमी की जा सकती है?
मायोपिया में चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस से देखने में मदद मिलती है। लेकिन सामान्य चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस आँख की बढ़ी हुई लंबाई को छोटा नहीं करते।
बच्चों में अगर नंबर तेज़ी से बढ़ रहा हो, तो नेत्र विशेषज्ञ मायोपिया की प्रगति धीमी करने के कुछ विकल्प सुझा सकते हैं। इनका उद्देश्य आँख की लंबाई बढ़ने और नंबर में बदलाव की गति को धीमा करना होता है।
कुछ उपलब्ध विकल्प हैं:
खास डिज़ाइन वाले चश्मे के लेंस: कुछ लेंस दूर की नज़र साफ़ करने के साथ मायोपिया की प्रगति धीमी करने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं।
विशेष कॉन्टैक्ट लेंस: कुछ मल्टीफोकल या परिधीय फोकस वाले लेंस बच्चों में नंबर बढ़ने की गति कम करने में मदद कर सकते हैं।
ऑर्थोकेरेटोलॉजी (Orthokeratology): इसमें रात के समय खास कॉन्टैक्ट लेंस पहने जाते हैं। ये कॉर्निया के आकार में अस्थायी बदलाव करते हैं, जिससे दिन में बिना चश्मे के देखने में मदद मिल सकती है। इनके इस्तेमाल से आँखों में संक्रमण का जोखिम भी जुड़ा होता है।
कम मात्रा वाली एट्रोपिन आई ड्रॉप्स (Low-dose Atropine): कुछ बच्चों में नेत्र विशेषज्ञ नंबर बढ़ने की गति धीमी करने के लिए इनका सुझाव दे सकते हैं। ये हर बच्चे के लिए सही नहीं होतीं और इनके कुछ दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।
इन विकल्पों के फ़ायदे, सीमाएँ और जोखिम अलग-अलग हैं। बच्चे की उम्र, आँखों की जाँच और नंबर में बदलाव को देखकर नेत्र विशेषज्ञ तय करते हैं कि कौन-सा विकल्प सही रहेगा।
किसी भी आई ड्रॉप या खास कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तेमाल अपनी मर्ज़ी से शुरू न करें।
मायोपिया की प्रगति धीमी करने का उद्देश्य आमतौर पर नंबर बढ़ने की गति को कम करना होता है। इससे हर बच्चे का नंबर शून्य हो जाएगा या आँख की लंबाई पहले जैसी हो जाएगी, ऐसा दावा सही नहीं है।
पोषण और आँखों की सेहत
संतुलित भोजन आँखों के सामान्य स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। विटामिन A, ल्यूटिन, ज़ीएक्सैंथिन और दूसरे पोषक तत्वों के खाद्य स्रोतों के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारा लेख पढ़ें:
आँखों की सेहत के लिए भोजन और विटामिन
ध्यान रखें कि संतुलित भोजन आँखों के सामान्य स्वास्थ्य में सहायक है, लेकिन किसी खास भोजन या विटामिन से मायोपिया का नंबर कम होने का पक्का प्रमाण नहीं है।
आँखों की जाँच कब करानी चाहिए?
इन स्थितियों में आँखों की जाँच कराना सही रहेगा:
बच्चे को दूर की चीज़ें देखने में परेशानी हो।
स्कूल में ब्लैकबोर्ड साफ़ न दिखाई दे।
पुराने चश्मे से साफ़ दिखाई न दे।
बच्चा दूर देखने के लिए बार-बार आँखें सिकोड़ता हो।
वयस्कों को धुंधला दिखाई देने लगे या नज़र में बदलाव महसूस हो।
चश्मा लगाने के बाद भी साफ़ दिखाई न दे।
जाँच के दौरान नेत्र विशेषज्ञ देखने की क्षमता और चश्मे के नंबर की जाँच कर सकते हैं। ज़रूरत पड़ने पर आँखों की दूसरी जाँचें भी की जा सकती हैं।
बच्चों में मायोपिया कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है, यह समझने के लिए कुछ मामलों में आँख की लंबाई भी मापी जा सकती है।
आयुर्वेदिक उत्पाद की जानकारी
आँखों की सेहत से जुड़े आयुर्वेदिक उत्पादों के बारे में जानकारी लेते समय उनकी सामग्री, उपयोग संबंधी निर्देश और सावधानियों को समझना ज़रूरी है। SS Herbal India के Eye Care Capsule के आधिकारिक उत्पाद पेज पर इसकी सामग्री, पैक की जानकारी और इस्तेमाल से जुड़े निर्देश पढ़ सकते हैं।
ज़रूरी सावधानी: इस उत्पाद को मायोपिया का इलाज, चश्मे का नंबर कम करने या आँखों की लंबाई में बदलाव करने वाला उत्पाद न मानें। इसकी सामग्री की सूची अपने-आप किसी चिकित्सकीय लाभ का प्रमाण नहीं है। यदि आपको आँखों से जुड़ी कोई समस्या है या आप पहले से दवाएँ लेते हैं, तो इस्तेमाल से पहले योग्य चिकित्सक या नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लें।
ज़रूरी चेतावनी
अचानक नज़र कम होना, आँख में तेज़ दर्द, रोशनी की चमक दिखाई देना या अचानक नए काले धब्बे अथवा तैरते हुए बिंदु दिखना सामान्य रूप से चश्मे का नंबर बदलने की समस्या नहीं माननी चाहिए।
ऐसे लक्षणों में देर न करें। तुरंत नेत्र चिकित्सक या आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या मोबाइल देखने से आँखों का नंबर बढ़ता है?
मोबाइल को मायोपिया का एकमात्र कारण नहीं माना जाता। लंबे समय तक पास से स्क्रीन देखने और बाहर कम समय बिताने जैसी आदतें इसके जोखिम से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए बच्चों के स्क्रीन समय और बाहर खेलने के बीच संतुलन रखना ज़रूरी है।
2. बच्चों में मायोपिया किस उम्र में शुरू हो सकता है?
मायोपिया अक्सर 6 से 14 वर्ष की उम्र के बीच शुरू होता है, लेकिन इससे कम या अधिक उम्र में भी हो सकता है। कुछ बच्चों में शुरुआती वयस्क उम्र तक चश्मे का नंबर बढ़ सकता है।
3. क्या माता-पिता को चश्मा होने से बच्चे को भी नंबर आ सकता है?
अगर माता-पिता में से किसी एक या दोनों को मायोपिया है, तो बच्चे में भी इसका जोखिम बढ़ सकता है। हालाँकि, इसका यह मतलब नहीं है कि बच्चे को भी यह समस्या ज़रूर होगी। नियमित जाँच से उसकी नज़र में होने वाले बदलाव का पता लगाया जा सकता है।
4. क्या आँखों का नंबर अपने-आप कम हो सकता है?
मायोपिया का नंबर अपने-आप कम हो जाएगा, ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। कुछ स्थितियों में नज़र या नंबर में अस्थायी बदलाव हो सकता है। सही वजह जानने के लिए आँखों की जाँच ज़रूरी है। मायोपिया की प्रगति धीमी करने का मुख्य उद्देश्य आमतौर पर नंबर बढ़ने की गति को कम करना होता है।
5. क्या चश्मा पहनने से आँखों का नंबर बढ़ता है?
नहीं, सही नंबर का चश्मा पहनने से मायोपिया नहीं बढ़ता। चश्मा रोशनी को सही जगह फोकस करने में मदद करता है, जिससे दूर की चीज़ें साफ़ दिखाई देती हैं। नंबर में बदलाव आँखों के विकास या दूसरे कारणों से हो सकता है।
6. क्या रोज़ बाहर खेलने से बच्चों में मायोपिया का जोखिम कम हो सकता है?
दिन के उजाले में बाहर समय बिताने से बच्चों में मायोपिया शुरू होने का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है। हालाँकि, इससे इसकी संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती। बाहर खेलने के साथ नियमित आँखों की जाँच भी ज़रूरी है।
7. क्या बड़ों में भी मायोपिया बढ़ सकता है?
हाँ, कुछ वयस्कों में पहले से मौजूद मायोपिया बढ़ सकता है, जबकि कई लोगों में यह स्थिर हो जाता है। इसके अलावा, प्रेसबायोपिया, डायबिटीज़ या आँखों की दूसरी समस्याओं के कारण भी नज़र बदल सकती है। सही वजह जानने के लिए आँखों की जाँच कराना ज़रूरी है।
निष्कर्ष (Conclusion)
आँखों का नंबर बढ़ने के पीछे मायोपिया, आँख की लंबाई में बदलाव, आनुवंशिकता और कुछ स्वास्थ्य स्थितियाँ जैसे कई कारण हो सकते हैं। बच्चों में बाहर कम समय बिताना और लंबे समय तक पास की चीज़ों पर ध्यान लगाना भी मायोपिया के जोखिम से जुड़े कारक हैं। वहीं, बड़ों में उम्र और स्वास्थ्य से जुड़े बदलावों के कारण भी नज़र प्रभावित हो सकती है।
बच्चों को दिन के उजाले में बाहर समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करें और पढ़ाई या स्क्रीन इस्तेमाल के बीच नियमित विराम दें। समय-समय पर आँखों की जाँच करवाना भी ज़रूरी है, ताकि नज़र में होने वाले बदलाव का समय पर पता चल सके।
यदि मायोपिया का नंबर बढ़ रहा है, तो नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लें। उनकी सलाह से कुछ विकल्प बच्चों में मायोपिया की प्रगति धीमी करने में मदद कर सकते हैं। सही जानकारी, नियमित जाँच और आँखों की देखभाल से नज़र को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
मेडिकल डिस्क्लेमर
यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य-जागरूकता के लिए है। इसमें दी गई जानकारी आँखों की जाँच, बीमारी की पहचान या डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है।
अगर चश्मे का नंबर बदल रहा है, धुंधला दिखाई दे रहा है या आँखों से जुड़ी कोई परेशानी है, तो योग्य नेत्र चिकित्सक से सलाह लें। मायोपिया की प्रगति धीमी करने के लिए विशेष चश्मे, कॉन्टैक्ट लेंस या आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल विशेषज्ञ की सलाह के बिना न करें।
स्रोत सूची (Source Index)
National Eye Institute (NEI) – Nearsightedness (Myopia)
मायोपिया के कारणों, लक्षणों, पारिवारिक जोखिम, आँख की लंबाई और जाँच से जुड़ी जानकारी।
स्रोत पढ़ेंWorld Health Organization (WHO) – Refractive Errors
अपवर्तन संबंधी दोषों, मायोपिया और प्रेसबायोपिया से जुड़ी जानकारी।
स्रोत पढ़ेंAmerican Academy of Pediatrics (AAP) – Myopia in Children and Teens
बच्चों और किशोरों में मायोपिया से जुड़ी जानकारी।
स्रोत पढ़ेंNational Academies – Myopia: Causes, Prevention, and Treatment
मायोपिया के आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों, आँखों के विकास तथा इसकी प्रगति धीमी करने के तरीकों पर शोध-समीक्षा।
स्रोत पढ़ेंAmerican Academy of Ophthalmology (AAO) – Myopia Control in Children
बच्चों में मायोपिया की प्रगति धीमी करने के लिए विशेष चश्मे, कॉन्टैक्ट लेंस और कम मात्रा वाली एट्रोपिन आई ड्रॉप्स से जुड़ी जानकारी।
स्रोत पढ़ें
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Disclaimer: This article is for general informational purposes only and is not a substitute for professional medical advice. Always consult a qualified Ayurvedic practitioner or physician before acting on any information here.
About the Author

डॉ. सुहैल सिद्दीकी (Dr Suhail Siddiqui), B.A.M.S., एक योग्य एवं पंजीकृत आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं। उन्होंने चौधरी ब्रह्म प्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान (Choudhary Brahm Prakash Ayurved Charak Sansthan), गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से वर्ष 2024 में बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी (B.A.M.S.) की डिग्री प्राप्त की है। वे उत्तर प्रदेश बोर्ड ऑफ इंडियन मेडिसिन (UP Board of Indian Medicine) में पंजीकृत चिकित्सक हैं — रजिस्ट्रेशन संख्या 77487 — और वर्तमान में SS Herbal India के साथ आयुर्वेदिक चिकित्सक (Ayurvedic Physician) के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, जीवनशैली प्रबंधन और रोगों की रोकथाम से जुड़े विषयों में विशेष रुचि है। डॉ. सुहैल मुख्य रूप से कान, नाक और गला (ENT) से संबंधित समस्याओं, टिनिटस (Tinnitus), कान में फंगल इंफेक्शन, हकलाना, पथरी, मधुमेह, पाचन संबंधी समस्याओं तथा अन्य सामान्य स्वास्थ्य विषयों पर आयुर्वेद आधारित जानकारी साझा करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल स्वास्थ्य विषयों को सरल भाषा में समझाकर लोगों तक विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी पहुँचाना है। SS Herbal India पर प्रकाशित लेखों के लिए डॉ. सुहैल आयुर्वेदिक ग्रंथों, उपलब्ध आधुनिक शोध, चिकित्सा साहित्य तथा विश्वसनीय स्वास्थ्य स्रोतों का अध्ययन करते हैं। उनके नाम से प्रकाशित होने वाला प्रत्येक लेख प्रकाशन से पहले उनकी समीक्षा से होकर जाता है। प्रत्येक लेख का उद्देश्य पाठकों को संतुलित, तथ्य-आधारित और उपयोगी स्वास्थ्य जानकारी प्रदान करना है। यह जानकारी केवल शैक्षणिक एवं जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की जाती है और किसी भी प्रकार से व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। डॉ. सुहैल सिद्दीकी का लक्ष्य लोगों को सही स्वास्थ्य जानकारी देकर उन्हें स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, रोगों की बेहतर समझ विकसित करने और अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनने में सहायता करना है।
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